मज़दूर विरोधी फ़ैसले ले रही है सुखू सरकार-भूपेंद्र
फ़ैसले के विरोध में 15 मार्च को खण्ड स्तर पर होंगे प्रदर्शन
BHK NEWS HIMACHAL
सरकाघाट:हिमाचल प्रदेश में दो माह पहले सुखविंदर सिंह सुखू के नेतृत्व में बनी कांग्रेस पार्टी की सरकार उनको मिले जनादेश के ख़िलाफ़ फ़ैसले ले रही है ये आरोप मज़दूर संगठन सीटू ने लगाया है।सरकार बनने के दूसरे ही दिन इस सरकार ने 12 दिसंबर 2022 को हिमाचल प्रदेश राज्य श्रमिक कल्याण बोर्ड की ओर से मज़दूरों के पंजीकरण और उन्हें मिलने वाले लाभों पर रोक लगा दी है और मुख्यमंत्री इन लाभों को बहाल करने बारे कोई निर्णय नहीं ले रहे हैं। सीटू से सबंधित मनरेगा व निमार्ण मज़दूर यूनियन के राज्य महासचिव व पूर्व ज़िला पार्षद भूपेंद्र सिंह ने बताया कि हिमाचल प्रदेश में वर्ष 2009 में बने राज्य श्रमिक कल्याण बोर्ड के साथ अभी तक चार लाख से ज़्यादा मज़दूर पंजीकृत हुए हैं जिन्हें बोर्ड से एक दर्ज़न से ज़्यादा क़िस्म के लाभ मिलते हैं।जिनमें मज़दूरों के बच्चों की पढ़ाई, विवाह शादी, चिकित्सा, प्रसूति, विक्लांगता, मृत्यु, दाहसंस्कार और पेंशन इत्यादि के लाभ प्रमुख हैं।हालांकि बोर्ड के पास वर्तमान में चार हज़ार करोड़ रुपये का कोष मौजूद है और ये सब पैसा सरकारी ख़ज़ाने के बजाये निर्माण कम्पनियों व ठेकेदारों से कटने वाले सेस से एकत्रित होता है।वर्ष 2013 में मनरेगा मज़दूर जो ग्राम पंचायतों में कार्य करते हैं उन्हें भी निर्माण मज़दूर घोषित किया गया था और उसके बाद वे भी बोर्ड के सदस्य बनने लगे और उन्हें भी ये सब प्रकार के लाभ मिलते थे। लेकिन प्रदेश में जिऊँ ही कांग्रेश पार्टी की सरकार ने पदभार ग्रहण किया उसके पहले ही दिन बोर्ड के सचिव ने इन मज़दूरों के लाभ रोकने की अधुसूचना जारी कर दी गई और अभी तक इस बारे मुख्यमंत्री और उनके मंत्री ख़ामोश बैठे हैं।हालांकि यूनियन ने उसी समय इस बारे प्रतिकृया दी थी और इसके लिए बोर्ड की अफसरशाही को इसके लिए जिम्मेवार ठहराया था लेकिन अब तक भी सरकार इस बारे कोई क़दम नहीं उठा रही है जिससे ये बात साफ़ हो गई है कि बोर्ड के सचिव ने ये फ़ैसला मुख्यमंत्री की अनुमति से ही लिया होगा।यही नहीं बोर्ड के सचिव ने कुछ दिन पहले बोर्ड में कार्यरत आउटसोर्सिंग कर्मचारियों से साथ मीटिंग बुलाई और उसमें श्रम अधिकारियों को शामिल नहीं किया औऱ उसके आधार पर रोज़गार प्रपत्र और सेस बारे निर्णय ले लिया जबकि ये निर्णय मन्त्रिमण्डल में होना होता है।बोर्ड के सचिव ने अब इसके बारे में दो दिन पहले अधिसूचना जारी कर दी है।जिसके लिए उन्होंने ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में जो निर्माण कार्य होते हैं उनमें सेस न देने वाले नियोक्ताओं के पास काम करने वाले मज़दूरों को इससे वंचित कर दिया है।इसी प्रकार वे मनरेगाकर्मियों को पहले ही इससे बाहर कर चुके हैं।इसप्रकार अब कोई भी मज़दूर बोर्ड का सदस्य नहीं बन सकता है।वैसे भी पिछले साल अक्टूबर माह के बाद सचिव द्धारा सभी प्रकार के लाभ रोक दिए हैं और अब प्रदेश भर में इस सरकार के प्रति ये सन्देश जा रहा है कि ये मज़दूर विरोधी फ़ैसले ले रही है।यही नहीं बोर्ड में एक अधिकारी को जो पिछली सरकार ने एक्सटेंशन दी थी उसे भी जारी रखा गया है और वे भी सचिव के साथ मिलकर इस प्रकार के फ़ैसले ले रहे हैं और लाखों मज़दूरों की सहायता रुक गई है।इसलिये यूनियन की मांग है कि बोर्ड से मिलने वाले लाभ तुंरत बहाल किये जायें और मजदूरों का बोर्ड से पंजीकरण और नवीनीकरण कार्य जल्दी से जल्दी शुरू किया जाए।यूनियन ने सरकार को चेतवानी देते हुए मांग की है कि इस मसले को अगले 15 दिनों में सुलझाया जाए अन्यथा यूनियन 15 मार्च को प्रदेश भर में खण्ड व ज़िला मुख्यालयों पर प्रदर्शन करेगी और ज़रूरत पड़ी तो शिमला स्थित बोर्ड कार्यालय का घेराव किया जायेगा।


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