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सोमवार, 2 दिसंबर 2024

*दलाशवासियों ने बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाई ऐतिहासिक मेला बूढ़ी दियाऊड़ी*

 *दलाशवासियों ने बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाई ऐतिहासिक मेला बूढ़ी दियाऊड़ी*








          उमाशंकर दीक्षित 

दलाश (कुल्लू )। बाह्य सिराज क्षेत्र के दलाश की बूढ़ी दियाऊड़ी स्थानीय लोगों ने सोमवार को बड़े हर्षोल्लास व धूमधाम के साथ मनाई। लोगों ने इसे जोगेश्वर महादेव के परिसर में मनाई।

       यह मेला काफ़ी मशहूर है जो प्राचीन एवं ऐतिहासिक दृष्टि से अपना एक बड़ा महत्व रखता है। बूढ़ी दियाऊड़ी का यह मेला मार्गशीर्ष मास की अमावस्या तिथि को प्रतिवर्ष मनाया जाता है। लोग यहां प्राचीनकाल से मेले की परम्परा को बड़े शौक से निभाते आ रहे हैं।



  इस दिन लोगों ने स्थानीय देवता जोगेश्वर महादेव के रथ को देवता की कोठी से ढ़ोल ढमाके के साथ लाया गया। लोगों ने खूब नृत्य किया तथा माला नाटी डालकर भरपूर मनोरंजन किया। उसके वाद लोगों ने बांड नृत्य  का खूब आनंद लिया जो इस मेले का विशेष आकर्षण होता है। यह बांड खेल परम्परागत प्राचीन खेल है जिसे स्थानीय लोग खुले में खेलते हैं। इस दिन लोगों ने बांड को नाचते झूमते हुए बाहर निकाला और बांड का खेल शुरू किया। इस बांड खेल में स्थानीय लोग दलाश की डिंगीधार फाटी और सोईधार फाटी के मुताबिक दो गुटों में बंट जाते हैं। ये दो गुट बांड को खींचते हैं जिस तरफ बांड जाता है अथवा ज्यादा भाग जाता है वह गुट विजयी माना जाता है और जोगेश्वर महादेव का आशीर्वाद पाते हैं। 



     बताया जाता है कि यह बांड नृत्य प्राचीन समय में देवता और राक्षस की हार जीत के खेल का द्योतक है। 

      प्राय: इन मेलों में सभी जगह काव गाये जाते हैं, चाहे नई दिवाली हो या बूढ़ी दिवाली। दलाश बूढ़ी दियाऊड़ी में काव गीत गाकर लोगों ने अपनी प्राचीन गूढ परम्परा निभाई। अमूमन बूढ़ी दियाऊड़ी में चूड़ी खेल भी सभी जगह खेला जाता है परन्तु स्थान आभाव के कारण यहां पर अब चूड़ी खेल गौण हो चुका है।

      यह खुशी का पर्व दीपावली से एक महीने वाद मनाया जाता है। भगवान श्रीराम कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या के दिन अयोध्या वापिस लौटे थे उस दिन लोगों ने खूब खुशियों के पर्व दीपावली पर्व को मनाया । 



    उत्तरी भारत के दूर दराज व गिरि कंदराओं में भगवान श्रीराम की वापसी का एक महीने के वाद पता चला था अर्थात लोग दीपावली के पर्व को एक महीने के वाद मनाने लगे। अतः इसे बूढ़ी दिवाली अथवा बूढ़ी दियाऊड़ी कहा जाने लगा। बूढ़ी दिवाली निर्मण्ड, करसोग तथा आनी क्षेत्र के समेत कई जगह बड़े पारम्परिक ढंग से मनाते आये हैं। लोग यहां पर इस प्राचीन एवं ऐतिहासिक बूढ़ी दियाऊड़ी मेले के स्तर को बढ़ाने तथा इसे और बेहतर मनाने का प्रयास कर रहे हैं। जो इस क्षेत्र की एक अनूठी संस्कृति है जबकि स्थानीय लोगों की भी यही इच्छा है।

       दलाश मंदिर के कारदार रमेश वर्मा, चाँद भंडारी, प्रधान बहादुर सिंह ठाकुर तथा सोहनी राम राठी मेले के स्तर को बेहतर बनाने में एकमुश्त प्रयासरत हैं।



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