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शुक्रवार, 19 जून 2026

" *अना* "

 "  *अना*  " 




( अमित  मैहरा  ) 


तेरे बदलते लिबासों-सा लगता है मुझे तेरा प्यार ,

कभी बिजली की कौंध-सा उठता है ,

और कभी लगता है जैसे कभी हुआ ही नहीं !


मुझे हर पल बदलता-सा दिखता है मेरा दर्ज़ा ,

जैसे कि शाह हूँ सारे जहान का और कभी की कोई था ही नहीं !


मुझे सिमटती दिखती है अपनी परछाई ,

जैसे की शख़्स वहाँ कोई था ही नहीं  !


मैं मिटता जाता हूँ तेरी तलब में शबोसेहर , 

जैसे तुझ बिन मेरा होना कभी कुछ था ही नहीं !


मैं घटता देखता हूँ ख़ुद को , जैसे वक़्त गुज़रता हो ,

कि पकड़ना भी चाहूँ तो कभी हमसफ़र वो मेरा था ही नहीं !


मैं बैठा हूँ समेटने अपने किरदार की हक़ीक़त को ,

कि जैसे मैं कभी ख़ुद से मिला ही नहीं ! 


मेरे होने का भी शुब्हा था मुझे ,

ना जाने क्यों उसने कहा — “तुझ-सा  कोई था ही नहीं  " !


और दवा ग़म की क्या होगी ,

कि मेरे हिस्से का ग़म भी मेरा था ही नहीं !


मेरी बेतरतीबी को तेरी तरतीब मिल जाए ,

ये भी ज़ीस्त में मेरी लिखा कभी था ही नहीं !


कि फ़ैसला हो मेरे हक़ में — सोचा तो कई बार ,

पर कोई दावर, कोई पैरोकार मेरा था ही नहीं !


उसकी अना से मेरा क्या वास्ता ,

कि मुझे मेरा घर उस ओर दिखा ही नहीं !


और वो कहते हैं कि मेरी मुराद ओ मसीहा मेरे ,

ये जो ज़ोर है इसमें मेरा मशग़ला ही नहीं !


ले आओ मेरे चारागर, दवा कोई ,

जो मुझे बता दे कि तू था कि नहीं  ! 

                     # 

=   अमित  मैहरा  { एच. ए. एस. } , 

ए. डी. सी. ,   चम्बा 

{ हि. प्र. }

*BHK*   में 

प्रस्तुति  :  -  मुमुक्षु के. ठाकुर

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