" *अना* "
( अमित मैहरा )
तेरे बदलते लिबासों-सा लगता है मुझे तेरा प्यार ,
कभी बिजली की कौंध-सा उठता है ,
और कभी लगता है जैसे कभी हुआ ही नहीं !
मुझे हर पल बदलता-सा दिखता है मेरा दर्ज़ा ,
जैसे कि शाह हूँ सारे जहान का और कभी की कोई था ही नहीं !
मुझे सिमटती दिखती है अपनी परछाई ,
जैसे की शख़्स वहाँ कोई था ही नहीं !
मैं मिटता जाता हूँ तेरी तलब में शबोसेहर ,
जैसे तुझ बिन मेरा होना कभी कुछ था ही नहीं !
मैं घटता देखता हूँ ख़ुद को , जैसे वक़्त गुज़रता हो ,
कि पकड़ना भी चाहूँ तो कभी हमसफ़र वो मेरा था ही नहीं !
मैं बैठा हूँ समेटने अपने किरदार की हक़ीक़त को ,
कि जैसे मैं कभी ख़ुद से मिला ही नहीं !
मेरे होने का भी शुब्हा था मुझे ,
ना जाने क्यों उसने कहा — “तुझ-सा कोई था ही नहीं " !
और दवा ग़म की क्या होगी ,
कि मेरे हिस्से का ग़म भी मेरा था ही नहीं !
मेरी बेतरतीबी को तेरी तरतीब मिल जाए ,
ये भी ज़ीस्त में मेरी लिखा कभी था ही नहीं !
कि फ़ैसला हो मेरे हक़ में — सोचा तो कई बार ,
पर कोई दावर, कोई पैरोकार मेरा था ही नहीं !
उसकी अना से मेरा क्या वास्ता ,
कि मुझे मेरा घर उस ओर दिखा ही नहीं !
और वो कहते हैं कि मेरी मुराद ओ मसीहा मेरे ,
ये जो ज़ोर है इसमें मेरा मशग़ला ही नहीं !
ले आओ मेरे चारागर, दवा कोई ,
जो मुझे बता दे कि तू था कि नहीं !
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= अमित मैहरा { एच. ए. एस. } ,
ए. डी. सी. , चम्बा
{ हि. प्र. }
*BHK* में
प्रस्तुति : - मुमुक्षु के. ठाकुर

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